इंजिनियर : एक काव्य कथा (Engineer: A poetic narrative )
इंजिनियर : एक काव्य कथा (संपूर्ण भाग )
Engineer: A poetic narrative
किलकारियों में चीखा , सब ने ख़ुशी मनाई
आने लगी बधाई , बंटने लगी मिठाई |
फिर ज्योतिषी भी आया , और कुंडली बनाई
इंजिनियर बनेगा , होगी बड़ी कमाई ||
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भरने लगा अब पग वह , घरौंदे लगा बनाने
बालू ही की इमारतें , लगने लगा सजाने ||
पंडित ने सच कहा था , इंजिनियर बनेगा
इक दिन बड़ा बनेगा , फ्यूचर में कुछ करेगा ||
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हर सुख दिया पिता ने, मम्मी भी कम नहीं थी |
बेटे की परवरिश में , दिन रात राम गयी थी ||
अब वह घडी भी आई , डिगरी थी मिलने वाली |
उसका भी नाम आया , बजने लगी थी ताली ||
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पगली-सी हो गयी थी , मम्मी ख़ुशी के मारे |
मन की मुरादें जीतीं , ग़म ज़िन्दगी के हारे ||
तब फिर बंटी मिठाई , और फिर मनी दीवाली |
कांटे मिटे जीवन के, फूलों की बिखरी लाली ||
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घर में बजी शहनाई , तब फिर बंटी मिठाई |
सुन्दर सलोनी मॉडर्न , बहू भी घर में आई ||
मम्मी के दुःख के दिन अब, ढलने लगे थे सुख में |
बहू नहीं बेटी है , हर वक़्त था यह मुख में ||
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लेकिन बहू मॉडर्न थी, मम्मी बना न पाई |
किस्मत को कोसती थी, काहे को यहाँ लायी?
बुड्ढे ससुर की खांसी , बुढ़िया की वो दवाई |
घर दूसरा बनाओ, उसने थी रट लगायी ||
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इंजिनियर था आखिर , घर दूसरा बनाया |
माता- पिता को छोड़ा, नवीन घर में आया ||
सबको निमंत्रण भेजा, उनको नहीं बुलाया |
पल भर में दिल का रिश्ता, था कर दिया पराया ||
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मम्मी के सारे सपने, अब चूर हो गए थे |
उसके जिगर के टुकड़े जो दूर हो गए थे ||
उसको अतीत सारा, अब याद आ रहा था |
इंजिनियर का मतलब, समझ से जा रहा था ||
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पापा ने पकड़ी खटिया, हड्डी थी उनकी टूटी |
वे हो गए अकेले, किस्मत थी उनकी फूटी ||
खाने को कुछ नहीं था,फांको में जी रहे थे |
अपने ग़मों को दोनों, अब मिलके पी रहे थे ||
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हर रोज़ घर में पार्टी, कुत्ता भी खाए मछली |
बेटा ख़ुशी से पागल, बीवी नशे में पगली ||
माता- पिता अब उनकी, नज़रों से हट रहे थे |
दिन- रात उनके अब तो, मज़े में कट रहे थे ||
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अगले ही साल बीवी के, पैर हुए भारी |
बेटे ने अपनी बीवी की, आरती उतारी ||
माँ- बाप थे अनजाने, उनको न कुछ बताया |
भगवान् ने न जाने , किस मिट्टी से बनाया ||
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बीवी थी लेबर रूम में, फिर नर्स बाहर आई |
बेटा हुआ है तुमको, अब चाहिए मिठाई ||
तब फिर बंटी मिठाई, आने लगी बधाई |
फिर ज्योतिषी भी आया, और कुंडली बनायी ||
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तुमसे बड़ा बनेगा, फ्यूचर में कुछ करेगा |
फिक्र मत करो तुम, इंजिनियर बनेगा ||
तुमने जो- जो किया है, उससे अधिक करेगा |
उन्नीस तुम चले तो, यह बीस तक चलेगा ||
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मन में हुयी थी दस्तक, कुछ बोध हो रहा था |
आँखों में थी उदासी, मन उसका रो रहा था ||
पापा कहाँ हैं मेरे? मम्मी मेरी कहाँ है?
ड्राइवर निकालो गाड़ी, जाना मुझे वहां है ||
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डूबा अतीत में वह, बचपन था याद आया |
पोते- बहू को लेकर, बेटा था गाँव आया ||
मन में थी बेकरारी, बेचैनी भी बड़ी थी |
पापा की अरथी पर ही, मम्मी मरी पड़ी थी ||
—शिव नारायण वर्मा (०७-०९-२०१०)
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 17 फरवरी 2018 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!
ReplyDeleteउफ्फ.. हृदय विदारक
ReplyDeleteपापा की अरथी पर ही, मम्मी मरी पड़ी थी ||